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MARWARI OF MUZAFFARPUR

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 मुजफ्फरपुर में 150 साल पुराना इतिहास उत्तर बिहार की व्यापारिक राजधानी मुजफ्फरपुर की बात करें, तो सहज ही इस व्यापार को सींचने वाले मारवाड़ी समाज की याद आ जाती है। मुजफ्फरपुर में इस समाज का इतिहास करीब 150 साल पुराना है। राजस्थान से तंगहाली व बेरोजगारी की हालत में यह समाज उसी तरह पलायन को मजबूर हुआ था, जिस तरह आज बिहार से लोगों का पलायन हो रहा है। अपनी मिट्टी से सैकड़ों मिल दूर इस समाज ने बिहार की अर्थव्यवस्था संभालने में निर्णायक भूमिका निभाई है। मुजफ्फरपुर में इस समाज के 18 हजार वोटर हैं। करीब 5200 परिवार, जिनकी आबादी 54 हजार के आसपास होगी। इनका सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र सुतापट्टी कपड़ा मंडी है, जिसका टर्न ओवर करीब 1800 करोड़ रुपये है। इस कपड़ा मंडी में करीब पांच हजार स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है। मुजफ्फरपुर के सुतापट्टी के थोक कपड़ा मंडी से उत्तर बिहार के सभी जिलों में कपड़े की आपूर्ति होती है। कपड़ा इनका मुख्य व्यवसाय जरूर बन गया है, पर समाज के लोग किराना, हार्डवेयर व दवा व्यवसाय में भी गहरे जमे हैं। माडवारी समाज की बड़ी सौगात आई हॉस्पिटल मारवाड़ी समाज की शहर को सौगात मारवाड़ी समाज ने ...

BLAZING THOUGHTS

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स्वतंत्रता सेनानी ब्रजनंदन बाबू व धर्मपत्नी मुज़फ़्फ़रपुर के साहेबगंज प्रखंड में एक गांव है, परसौनी। यहां के एक स्वतंत्रता सेनानी थे, ब्रजनंदन प्रसाद सिंह। इस खांटी कांग्रेसी भूमिहार परिवार ने तीन ऐसे रत्न दिए, जिन्होंने अपने बुजुर्गों से अलग सोच विकसित किया, उसे जिया और फैलाया। ये सोच थी समाजवाद, वामपंथ व नक्सलवाद। ये तीन रत्न आज हमारी धरोहर हैं, जो कल नहीं रहेंगे, पर अगली पीढ़ी उन्हें शिद्दत से याद करने को मजबूर होगी। एक खांटी कांग्रेसी परिवार में इस तरह तीन अलग अलग विचार का पलना, बढ़ना आपको आश्चर्यचकित कर देगा। पहले मुज़फ़्फ़रपुर के इन तीन भाइयों का नाम जान लें। सबसे बड़े भाई हैं डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा। पिता कांग्रेसी और आप समाजवाद के आज के बचे सबसे बडे स्तंभ। दूसरे भाई हैं डॉ. प्रभाकर सिन्हा। रिटायर आरडीएस कॉलेज प्राध्यापक व वाममार्गी। आप लोगों की राजनीतिक, आर्थिक स्वतंत्रता के सबसे बड़े पैरोकार में से हैं और जयप्रकाश नारायण द्वारा गठित प्रख्यात संगठन पीयूसीएल यानी पीपल यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टी के नेशनल प्रेसिडेंट रह चुके हैं। इस कांग्रेसी परिवार के सबसे छोटे रत्न हैं अरबिंद कुमार सिन्हा। नक्...

शराब के समुद्र पर मुज़फ़्फ़रपुर

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बेला से बरामद शराब के साथ तस्कर   शराबबंदी में लड़खड़ा रहे शहर के कदम शराबबंदी ने कैसे एक समानांतर अर्थव्यवस्था को जन्म दिया है, इसे मुजफ्फरपुर में देखा जा सकता है। जो शराब पहले सरकारी ठेके पर एक हजार में मिलती थी, वह अब फ़ोन करने पर लोगों के घर पर 1500 सौ में पहुंचा दिया जाता है। ये जो पांच सौ ऊपर से लगते हैं, उसमें पूंजी लगाने वाले का ब्याज, परिवहन खर्च, डिलीवरी बॉय का हिस्सा व संबंधित थाना क्षेत्र का हिस्सा शामिल होता है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि राज्य सरकार को शराब कारोबार से 500 करोड़ का टैक्स आता था। विशेषज्ञों के मुताबिक अब यह करीब 1500 करोड़ की आय वाला व्यवसाय हो चुका है। फर्क यही है कि यह टैक्स सरकार के खजाने में न जाकर, पूंजीपति, कारोबारी, डिलीवरी बॉय, वाहन मालिक व पुलिस के बीच बंट जाता है।        मुजफ्फरपुर से जानें शराबबंदी का हाल शराबबंदी एक अप्रैल 2016 से लागू की गई। 10 दिसंबर 2020 को मुजफ्फरपुर पुलिस ने चार साल का आंकड़ा जारी किया। इसके अनुसार इन चार सालों में जिले में 102561.683 यानी करीब एक लाख लीटर देशी शराब बरामद किए, वहीं इसी अवधि में जिले में 793...

Saddlery achiever of muzaffarpur

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                             राष्ट्रपति के साथ नेशनल अवार्डी डॉ संगीता Saddlery achiever-1 एक छोटी बच्ची जन्म के कुछ ही दिन बाद मुजफ्फरपुर से अपने नानी के घर लखनऊ जाती है। कड़ी धूप में भी उसके चेहरे पर शिकन न देख नानी को अनहोनी की आशंका होती है। भागे भागे डॉक्टर के यहां पहुंचने पर पता चलता है कि बच्ची देख नहीं सकती। यह कोई साधारण गड़बड़ी नहीं बच्ची के मस्तिष्क में उस नस का ही अभाव था, जो देखी चीजों की जानकारी मस्तिष्क तक पहुंचाती है। परिवार को शहर दर शहर, क्लिनिक दर क्लिनिक करीब दो साल घूमने के बाद पता चलता है कि उसकी रोशनी कभी नहीं आएगी। बस यहीं से यह कहानी शुरू होते हुए आज उस मोड़ पर पहुंच चुकी है, जब वह बच्ची  Saddlery achiever के रूप में देश में स्थापित हो चुकी है। दिव्यांगजनों के लिये बन गयी पथ प्रदर्शक जिस बच्ची की संक्षिप्त कहानी बताई गई वह नेशनल अवार्ड विजेता डॉ संगीता अग्रवाल हैं। आप जवाहरलाल रोड में एक व्यवसायी परिवार में पैदा हुई व अंधेपन की विकलांगता की शिकार हो गईं। एक तो अंधापन, ऊपर से स्त्री। साम...

Martyr beyond memory lane

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 Martyr beyond memory lane डिक्सनरीऑफ मार्टीयर का विमोचन करते पीएम यह उस अवसर की तस्वीर है, जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में तिरहुत व खासकर मुजफ्फरपुर के बलिदान को करीब 162 साल बाद पहचान दी है। साथ ही इतिहास व इतिहासकारों की भूल को खुले मन से स्वीकार किया है। बता दें कि तस्वीर उस समय की है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 7 मार्च 2019 को देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में शहीद हुए लोगों की आधिकारिक किताब का लोकार्पण किया था। इस लोकार्पण ने तिरहुत में स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को ही बदल दिया। कैसे, ये आगे बताते हैं। खुदीराम बोस नहीं, वारिस अली पहले शहीद इस किताब के लोकार्पण के पहले तक तिरहुत व मुजफ्फरपुर का पहला शहीद खुदीराम बोस को माना जाता था। जिन्हें अंग्रेजों ने 11 अगस्त 1908 को 19 वर्ष की अवस्था में फांसी दी थी। इस किताब के लोकार्पण के बाद इतिहास ने अपनी भूल सुधार ली और तिरहुत व मुजफ्फरपुर का पहला शहीद होने का सेहरा जमादार वारिस अली के सिर बंध गया, जिसे मुजफ्फरपुर सेंट्रल जेल ब्रेक करने की कोशिश करने वालों का साथ देने के आरोप में 7 जुलाई 1857 को फांसी दे दी गई। 163 साल...

Dreamer of muzaffarpur

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एलएनटी परिसर में ऐसे चलती है पाठशाला हालांकि दौर बहुत बुरा है।खासकर उन युवाओ के लिए , जो संसाधन की कमी से जूझ रहे हैं। आंखों में कैरियर के ऊंचे सपने हैं, लेकिन तंगी के कारण मुकम्मल इंतजाम नहीं जुटा पा रहे हैं।  कुछ ऐसी ही परिस्थिति में सबसे बेहतर खोज होती है, कुछ बड़ा मुकाम मिलता है या नई सोच पैदा होती है। किसी ऐसे ही संयोगवश 1993 को वसंतपंचमी के दिन एक संस्था सर्व (s.e.r.v.e) soci ety for education and reconstruction by voluntary efforts  की सथापना हुई। उद्देश्य: Serve क्रिकेट खेलने वाले तीन दोस्तों ने शुरू किया। उद्देश्य था जमाने से कदमताल मिलाने के लिए अंग्रेजी बोलने व सीखने का। प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करने का। संस्थापक : SERVE के संस्थापक आनंद कुमार धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने व ग्रामर सीखने की ललक ने क्रिकेट टीम को स्वाध्याय करने वालों की टीम बना दिया। इसमें योगदान रहा आनंद कुमार उर्फ बबलू जी का, आप अभी मुशहरी के माणिक विशुनपुर चांद उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक हैं, दूसरे कृष्ण कुमार झा जी का, आप अभी सेंट्रल कस्टम विभाग में अधीक्षक हैं, तीसरे, सनत भारद्वा...

मुजफ्फरपुर वाले क्यों

संचार क्रांति के दौर में जब दुनिया एक गांव हो गई है, मुजफ्फरपुर अपनी अच्छी बुरी विशेषताओं के साथ सबके सामने आए, ब्लॉग का यह एक मात्र उद्देश्य है। कोशिश है कि हम तथ्यों व घटनाओं को पूरी पड़ताल व प्रमाणिकता के साथ आपके सामने प्रस्तुत करें। इसमें प्रशासनिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक रंग के साथ मानवीय पहलू भी शामिल हो, इसकी भरपूर कोशिश रहेगी। हमें विश्वास है, इस मंच से जुड़कर आपको खुशी व संतुष्टि होगी। सादर मुजफ्फरपुर वाले