Martyr beyond memory lane

 Martyr beyond memory lane

डिक्सनरीऑफ मार्टीयर का विमोचन करते पीएम
यह उस अवसर की तस्वीर है, जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में तिरहुत व खासकर मुजफ्फरपुर के बलिदान को करीब 162 साल बाद पहचान दी है। साथ ही इतिहास व इतिहासकारों की भूल को खुले मन से स्वीकार किया है। बता दें कि तस्वीर उस समय की है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 7 मार्च 2019 को देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में शहीद हुए लोगों की आधिकारिक किताब का लोकार्पण किया था। इस लोकार्पण ने तिरहुत में स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को ही बदल दिया। कैसे, ये आगे बताते हैं।


खुदीराम बोस नहीं, वारिस अली पहले शहीद

इस किताब के लोकार्पण के पहले तक तिरहुत व मुजफ्फरपुर का पहला शहीद खुदीराम बोस को माना जाता था। जिन्हें अंग्रेजों ने 11 अगस्त 1908 को 19 वर्ष की अवस्था में फांसी दी थी। इस किताब के लोकार्पण के बाद इतिहास ने अपनी भूल सुधार ली और तिरहुत व मुजफ्फरपुर का पहला शहीद होने का सेहरा जमादार वारिस अली के सिर बंध गया, जिसे मुजफ्फरपुर सेंट्रल जेल ब्रेक करने की कोशिश करने वालों का साथ देने के आरोप में 7 जुलाई 1857 को फांसी दे दी गई।

163 साल लंबी चली शहादत की लड़ाई

दरअसल वारिस अली 1857 में बरुराज थाने में बतौर जमादार पदस्थापित थे। इनका संबंध आंदोलनकारियों से था, जिसमे पीर अली प्रमुख थे। पटना सिटी में वे किताब की दुकान चलाते थे। 1857 में सेंट्रल जेल ब्रेक करने की कोशिश हुई। बिहार अभिलेखागार में दर्ज सूचना के अनुसार करीब 12 हजार लोगों ने जेल घेर लिया था। उन्हें उकसाने के आरोप में जमादार वारिस अली को 7 जुलाई 1857 को पटना में फांसी दे दी गई। लेकिन यह इतिहास अभिलेखागार में ही दर्ज रहा व आधिकारिक तौर पर 11 अगस्त 1908 को फांसी पर लटकाए गए खुदीराम बोस पहले शहीद मान लिए गए। इतिहास व सिलेबस में भी यही पढ़ाया जाता रहा।
ऐसे बदला इतिहास, कइयों को मिली पहचान
डॉ. अशोक अंशुमन, बिहार कॉर्डिनेटर

केंद्र सरकार ने शहीदों पर जो पुस्तक जारी की उसके बिहार   प्रभारी एलएस कॉलेज के प्राध्यापक व इतिहासकार अशोक अंशुमन विस्तार से बताते हैं। उन्होंने गदर इन तिरहुत सहित कई किताबें लिखी हैं । वे कहते हैं कि इससे पहले शहीदों पर 1969 में आधिकारिक किताब छपी थी, जिसमे वारिस अली का नाम नहीं था। लेकिन तमाम सबूतों को इकट्ठा करने के बाद सरकार की नई किताब में उनका नाम शामिल हो गया है

वारिस अली की उपेक्षा का यह था काऱण

इतिहासकार अशोक अंशुमान बताते हैं कि निर्विवाद रूप से वारिस अली तिरहुत के पहले शहीद थे। लेकिन खुदीराम बोस का स्थानीय जुड़ाव था व उनकी शहादत भी बेहद नाटकीय थी। इन्होंने इतना कठोर व बड़ा कदम उठाया था कि सरकार हिल गई व युवा होने के कारण वे सभी के दिलो दिमाग पर छाए रहे। एक और बड़ा कारण समय का अंतराल रहा। 1857 का विद्रोह असफल हो गया व मामला भी पुराना हो गया, उसकी जगह नया स्वतंत्रता आंदोलन लोगोंके दिमाग मे छाया रहा।
डॉ.भोजनन्दन प्रसाद सिंह, पूर्व विभागाध्यक्ष

इतिहास की किताब में स्वर्णिम अद्ध्याय
एलएस कॉलेज के इतिहास विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ.विवेकानंद शुक्ल कहते हैं, वारिस अली को शहीद का दर्जा मिलने से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम इतिहास में एक स्वर्णिम पन्ना जुड़ा है। यह तिरहुत व मुजफ्फरपुर का नया व स्वर्णिम इतिहास कहा जायेगा। भले ही लोकप्रियता में युवा शहीद खुदीराम बोस आगे हों लेकिन मुजफ्फरपुर का सीना एक और बलिदानी के इतिहास से चौड़ा हो गया है। आने वाली पीढ़ी वारिस अली की कुर्बानी को जान सकेगी व फक्र महसूस कर सकेगी।

लेखक की कलम से
माता पिता के लिए उनकी हर संतान प्यारी होती है, फिर भी कुछ लोगों में खास कुछ होता है, जो उनका ध्यान खींचने में ज्यादा सफल होता है। कुछ ऐसा ही देश के दो सपूत वारिस अली व खुदीराम बोस की शहादत के मामले में हुआ होगा। इतिहास व इतिहासकार तटस्थ व सत्यान्वेषी होते है। तिरहुत के नए इतिहास को सलाम व उसे ढूढ़ने वाले इतिहासकार को भी सलाम।
-मुजफ्फरपुर वाले




टिप्पणियाँ

  1. वारिस अली निःसंदेह इस छेञ के प्रथम क्रान्तिकारी शहीद थे ।

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  2. Salute to the martyr Waris Ali. We have one more moment of pride...

    And I bow to the people who worked for highlighting his contribution and featuring his name in history...

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