Saddlery achiever of muzaffarpur

                            

राष्ट्रपति के साथ नेशनल अवार्डी डॉ संगीता


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एक छोटी बच्ची जन्म के कुछ ही दिन बाद मुजफ्फरपुर से अपने नानी के घर लखनऊ जाती है। कड़ी धूप में भी उसके चेहरे पर शिकन न देख नानी को अनहोनी की आशंका होती है। भागे भागे डॉक्टर के यहां पहुंचने पर पता चलता है कि बच्ची देख नहीं सकती। यह कोई साधारण गड़बड़ी नहीं बच्ची के मस्तिष्क में उस नस का ही अभाव था, जो देखी चीजों की जानकारी मस्तिष्क तक पहुंचाती है। परिवार को शहर दर शहर, क्लिनिक दर क्लिनिक करीब दो साल घूमने के बाद पता चलता है कि उसकी रोशनी कभी नहीं आएगी। बस यहीं से यह कहानी शुरू होते हुए आज उस मोड़ पर पहुंच चुकी है, जब वह बच्ची Saddlery achiever के रूप में देश में स्थापित हो चुकी है।


दिव्यांगजनों के लिये बन गयी पथ प्रदर्शक

जिस बच्ची की संक्षिप्त कहानी बताई गई वह नेशनल अवार्ड विजेता डॉ संगीता अग्रवाल हैं। आप जवाहरलाल रोड में एक व्यवसायी परिवार में पैदा हुई व अंधेपन की विकलांगता की शिकार हो गईं। एक तो अंधापन, ऊपर से स्त्री। सामने उम्र का लंबा रास्ता। पढ़ाई के लिए पहला नामांकन प्रसिद्ध स्कूल प्रभात तारा में हुआ, लेकिन अंधेपन के कारण वह वहां से छह माह के भीतर निकल दी गईं। तब पता चला कि तुर्की में एक अंधेपन के शिकार शिक्षक विक्रमादित्य ऐसे बच्चों को पढ़ाते है। फिर उनकी दादी रोज उन्हें जव्हारलाल रोड स्थित घर से तुर्की लेकर जातीं व चार पांच घंटे बाद वापस लेकर आतीं। तभी परिवार को पता चला कि दिल्ली में अंधेपन के शिकार बच्चों के लिए स्कूल है, महर्षि दयानंद के अंधे गुरु के नाम पर यह राष्ट्रीय ब्रिजनन्द अंध कल्याण विद्यालय खुला था जिसमे आगे की पढ़ाई हुई।

उच्च शिक्षा का था बेहद कठिन रास्ता

स्कूल से निकलने के बाद दिल्ली के जानकी देवी महाविद्यालय ने डॉ संगीता का नामांकन लेने से इनकार कर दिया।किसी तरह नामांकन मिला तो वह संस्कृत की गोल्डमेडलिस्ट बनीं। फिर डीयू से पीएचडी कीं। इस बीच कुछ दिनों के लिए एलएस कॉलेज में नामांकन लिया था, लेकिन परिवेश अच्छा न होने के कारण दिल्ली लौट गईं थीं।

अब एलएस कॉलेज में फैला रहीं रोशनी

आज डॉ संगीता अग्रवाल एलएस कॉलेज में संस्कृत की विभागध्यक्ष हैं। युवाओं में शिक्षा की रोशनी फैला रहीं हैं। इस बीच इन्होंने दिव्यांगों की सेवा व मदद के लिए शुभम विकलांग केंद्र स्थापित किया, जहां ऐसे बच्चों को शिक्षा दी जाती है। यह संस्था करीब 25 साल से काम कर रही है। इस बीच डॉ. संगीता अग्रवाल को 2019 में दिव्यांगों के रोल मोडेल श्रेणी में नेशनल अवार्ड मिला है।

जीवन संगिनी के साथ डॉ अनुपम

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कुढ़नी प्रखंड के बाघी गांव निवासी डॉ अनुपम कुमार दूसरे उदाहरण हैं। इनके पिता रामचंद्र झा बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के उप सचिव थे। बचपन मे डायरिया से ग्रस्त होने के बाद डॉ अनुपम कुमार के दोनों आंखों की रोशनी चली गई।परिवार में मातम छा गया। शोक में डूबे परिवार को इन्होंने यह कहकर ढाढस बंधाया की जो हो गया उसपर शोक न करें, मुझे पढ़ने दें ताकि में कुछ कर सकूं। इस सवाल पर की तुम देख नही सकते क्या कर लोगे, उस उम्र में ठोस जवाब दिया कि कुछ न किया तो असिस्टेन्ट प्रोफेसर बनूँगा और कुछ किया तो और आगे जा सकता हूँ। पटना ब्लाइंड स्कूल से पढ़ाई पूरी कर आप आज आरडीएस कॉलेज में इतिहास के प्राध्यापक हैं व शिक्षा की रोशनी फैला रहे हैं । आपके सपने मुज़फ़्फ़रपुर में एक आई बैंक स्थापित करना है। कहते हैं देश मे करीब एक करोड़ लोग दृष्टिहीन हैं । उनमें से 60 फीसदी ऐसे हैं जिन्हें दान में कॉर्निया मिल जाये तो वे दुनिया देख सकते हैं। 40 फीसदी ही ऐसे दृष्टिहीन हैं जिनके आंखों की रोशनी नहीं लौटाई जा सकती। ये बताते हैं मुज़फ़्फ़रपुर जैसे शहर में ऐसे दृष्टिहीनों के मार्गदर्शन के लिए कोई खास व्यवस्था नहीं है। दिव्यांग के लिए अवसर कम व चुनौतियां ज्यादा हैं। हालांकि इस कठिन परिस्थिति में धैर्य न गवाने वाले निश्चय ही अपनी मंजिल पाते हैं, वरना सबकुछ होते हुए भी लोग बर्बाद हो जाते हैं।

                            
शिक्षा की रोशनी फैलाते विजय कुमार

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एलएस कॉलेज में ऐसा ही एक और सितारा चमक रहा है। इसकी रोशनी दूर तक रास्ता दिखा रही है। आपका नाम विजय कुमार है व आप हिंदी के प्राध्यापक हैं। ब्रह्मपुरा के नुनफर तोला के जागरण चौक के निवासी हैं। पिता विश्वनाथ महतो किसान थे व काम पढ़े लिखे थे। उनकी पहली संतान विजय कुमार के सबसे बड़े भाई राजू महतो दृष्टिहीन थे। उन्होंने काफी संघर्ष किया व आज बक्सर में बतौर सरकारी शिक्षक कार्यरत हैं दुर्भाग्य से भाइयों में सबसे छोटे विजय कुमार के भी आंखों की रोशनी बचपन मे ही चली गई। गरीब परिवार और उसपर अंधापन। खैर बड़े भाई के मार्गदर्शन में इन्होंने पटना ब्लाइंड स्कूल से पढ़ाई की, फिर दिल्ली चले गए।वह डीयू में  पढ़ाई की व नेट निकल। अभी एलएस कॉलेज में पढ़ाने के साथ पीएचडी भी कर रहे हैं । ये बताते है कि ब्रेल लिपि में किताबों की कमी थी तो पाठ्यक्रम का ऑडियो कैसेट बनवा लेता था और उसे ही सुन सुन कर तैयारी की। एमए करने के दौरान ही केंद्रीय विद्यालय में नौकरी मिल गयी। ये बताते हैं कि दृष्टिहीनता वहीं अधिक है , जहां गरीबी व कुपोषण है। जाहिर है गरीबी व कुपोशान ही अभिशाप है, ऐसे में अंधापन के बाद तो सहज जीवन की कल्पना ही मुश्किल है। बतौर प्राध्यापक ये शिक्षा की रोशनी तो फैला ही रहे हैं, दिव्यांगजनों के अधिकार की लड़ाई भी हइकॉर्ट में लड़ रहे हैं बताते है कि बिहार में विकलांगता अधिनियम तो 1995 में लागू हुआ पर उसका लाभ दिव्यांगों को नहीं मिल पाया। जो बैकलॉग है, उसे भरने की लड़ाई वह राष्ट्रीय दृष्टिहीन संघ के बैनर तले लड़ रहे हैं । उन्हें विश्वास है एक दिन सभी दिव्यांगों को उनका अधिकार मिलकर रहेगा व समाज के साथ वे कदमताल कर पाएंगे।

अपने उद्देश्य को जी रहे दिनेश सिंह

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शिवहर के मूल निवासी दिनेश सिंह भी दृष्टिहीन हैं। पर इन्होंने इसकी परवाह कतई नहीं कि। इनके प्रेरणास्रोत इनके ग्रामीण डॉ आरपी सिंह बने जो दरभंगा में सीएन साइंस कॉलेज में प्राध्यापक थे। उन्होंने हो दृष्टिहीनता के बावजूद पढ़ने को प्रेरित किया व पिता किसान कामेश्वर सिंह को बताया कि दरभंगा में ब्लाइंड स्कूल है। स्कूल में दाखिले के साथ ही दिनेश सिंह के सपनों को पर लग गए। इन्होंने एलएस कॉलेज से उच्च शिक्षा हासिल की व टीचर ट्रेनिंग किया। फिर सरकारी नौकरी पाने में सफल रहे। आज बोचहां में राजकीयकृत पारसनाथ उच्चतर विद्यालय में कार्यरत हैं। इन्होंने बताया कि मैं समाज की सेवा करना चाहता था वह भी शिक्षा के क्षेत्र में। बड़ा न सही पर में अपने उद्देश्य को जी रहा हूँ। उन्होंने कहा कि विकलांगता अभिशाप तो होती है, पर मानव का संकल्प सबसे ऊपर होता है। एक बार संकल्प कर रास्ता चुनिए, दूरी खुद ब खुद तय होती जाएगी। एक दिन आप वहां होंगे जहां पहुंचने की कल्पना करते थे।

अपनी ओर से:
आज नई पीढ़ी को जितनी सुरक्षा, सुविधा व संसाधन परोसे जा रहे हैं, उसके परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं मिलते। अपनी असफलता के लिए युवा अक्सर गरीबी, साधनहीनता, विपरीत परिस्थिति को जिम्मेवार बताते दिखते हैं। उन्हें क्या मालूम कि दृष्टिहीनता से अधिक कठिन परिस्थिति क्या होगी। हमारे इन सितारों ने संघर्ष व सफलता की नई इबारत लिख डाली है। 


टिप्पणियाँ

  1. बेहतरीन औऱ प्रेरणा परक आलेख, यह उनलोगों के लिए आत्मनिर्भर बनने का मार्ग प्रशस्त करेगा जो नेत्रहीन स्वयं को असहाय औऱ मजबूर समझ बैठे हैं।

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  2. कभी कभी किसी की जुनून को देख कर अपने आप में भी जुनून आ जाता है I

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